Tuesday, June 4, 2019

शिक्षा, आज कल

                                                       

मै एक शिक्षिका हूँ , पब्लिक स्कूल शिक्षा व्यवस्था के साथ एक लम्बे समय से जुडी हुई हूँ । रोज़ की इस भागदौड़ से खुद के लिए चुराए दो पलों में कुछ लिखती रहती हूँ जिसे आधुनिक संचार माध्यम के एक बड़े प्लेटफार्म (ब्लॉग) के द्वारा अब आप लोगो से भी शेयर करूंगी। मेरे इन अड़तालिस वर्षों में ज़िन्दगी के कई पहलुओं से मेरा साक्षात्कार हुआ, जिसमे से कुछ एक से आपका परिचय करवाती हूँ। 

ख़ैर आज जिस विषय को लिखने की सोची वो है - शिक्षा, आज कल। पब्लिक स्कूल में पढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त किया है अतः भांति-भांति के विद्यार्थियों से प्रतिदिन पाला पड़ता रहा है।  इस क्षेत्र में मेरा अनुभव उन डाक्टरों से किंचित मात्र भी कम नहीं जो सरकारी मेडिकल कॉलेज में हाथ साफ़ करते है. (Pun intended)

  • मध्यम वर्गीय सरकारी कर्मचारियों के बच्चें जो अपने अभिभावकों की तरह सरकारी नौकर बनने का सपना लिए स्कूल आते हैं। 
  • पारम्परिक व्यवसायी परिवारों के बच्चें, जो मानसिक रूप से स्पष्ट रहते है कि उन्हें भविष्य में परिवार के व्यवसाय को ही आगे बढ़ाना है।  
  • बिगड़ैल बाप (माताओं को हल्के में  न लीजिये) के बिगड़ैल बच्चे, जिनके लिए स्कूल मात्र रौब झाड़ने और कैंटीन में  ब्रेड-पकौड़ा, फ्रूटी और समोसा उड़ाने के अलावा कुछ भी नहीं। 
  • अपनी शारीरिक अक्षमताओं को दर किनार कर ऊँची उड़ान भरने का दम रखने वाले बच्चें।   
  • इंट्रोवर्ट बच्चें जो कक्षा में वो कोना ढूँढ़ते है जहां टीचर की नज़र ना पड़े।  
  • लव बर्ड्स जो एक दूसरे को ऐसे निहारते है जैसे किसान अपनी फसल निहारता है। 
जितने तरह के बच्चें उतने तरह के माता-पिता जिनके दर्शन का लाभ हमे पेरेंट्स टीचर मीटिंग में होता है  :
  • कुछ पिता तो केवल अपना कर्तव्य पालन करने आते है।  उनको अपने बच्चे  की पढाई के बारे में किंचित मात्र भी जानने की उत्सुकता नहीं होतीं, यहाँ तक कि उनको यह भी नहीं पता होता की उनके बच्चे का एग्जाम कब हुआ।  वो तो अपनी पत्नी से प्रताड़ित होकर केवल हाजरी लगाने आते हैं। 
  • कुछ माताएं सीधे ब्यूटी पार्लर से कक्षा में लैंड करती है।  उनको इसी बात की बेहद ख़ुशी होती है को वो अपना नया सूट, साडी, जीन्स या हेयर स्टाइल दूसरे अभिभावकों को दिखा सकी।  
  • कुछ अभिभावकों को युद्ध का बिगुल बजाते हुए कक्षा में  प्रवेश करना ज़्यादा श्रेयस्कर लगता है।  उनके बच्चे को पढ़ाने वाले हर शिक्षक के लिए विशेष टिप्पड़ी करना और स्कूल एवं मैनेजमेंट का पोस्टमॉर्टेम करना अपना नितांत कर्त्तव्य समझते हैं।  
  • कुछ ऐसी माताएँ होती है जो बाल सुलभ ढंग से अपने बच्चे की शिकायत करती है - मैडम ये दूध नहीं पीता, हरी सब्ज़ियां नहीं खाता, सारा दिन टीवी और मोबाइल लेकर बैठा रहता है। मेरी तो सुनता ही नहीं। आप ही कुछ समझाइये .......
  • कुछ माताएं अपने बच्चे के डिप्रेशन की गाथा पढ़ने के लिए स्कूल आती है कि  कैसे उनका बच्चा पूरे दिन रोता रहा क्युकि फलां टीचर ने उसे डाट दिया। 
हमे याद आता है अपना बचपन जब हम स्कूल में थे, तो पिटाई या यूँ  कहिये सुताई तो आम बात थी।  कोई भी शिक्षक कभी भी कक्षा में किसी भी बच्चे के गाल पर अपना ऑटोग्राफ देकर चला जाता।  कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि घर जाकर शिकायत करे क्योंकि ये बात तो तय थी कि घर का कोई  भी सदस्य इस बात को लेकर स्कूल नहीं जायेगा, अपितु एक और थप्पड़ पड़ने की पूरी गुंजाईश होती।  साथ में ये भी सुनने को मिलता कि अच्छा किया जो मारा, तुम  जैसों को यही सजा मिलनी चाहिए।  आज सोचते है कि हम कभी डिप्रेशन में क्यों नहीं  गए ?

हमारे समय में  फर्स्ट डिवीज़न यदा कदा आते थे। वो भी ६० या ज़्यादा से ज़्यादा ७०%।  बोर्ड के परिणाम  के दिन पूरा मोहल्ला इकठ्ठा होता, बनर्जी साहब को, होनहार बेटी की बधाई देने के लिए।  आज ९०% रेज़ल्ट पर लोग मुँह पे बोलते है, "जी छोटा मत करो, कोई बात नहीं, अगली बार अच्छा करेगा"। और जनाब बच्चों का कॉन्फिडेंस तो देखिये ५०० में ४९९ अंक मिलने पर, उस एक अंक के लिए स्क्रूटिनी करवाते है!   

सोचती हूँ कहाँ लेकर जा रही ये शिक्षा इन बच्चों को?  क्या भविष्य है इनका?  कब तक दौड़ते रहेंगे और मंज़िल ही क्या है इनकी? अपने सपनों को पाने की  मृग मरीचिका क्या इन्हें ज़िन्दगी की छोटी- छोटी  खुशियों से वंचित नही कर रही ? अपने माता-पिता, भाई, बंधुओं  से दूर एक अनजान राह की तलाश में भटकते ये बच्चें अपनी योग्यता का सदुपयोग नही दोहन कर रहे हैं। ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि इन्हें सदबुद्धी  प्रदान करे और अपने बहुमूल्य जीवन की वास्तविक खुशियों को अनुभव करवायें। इन स्मृतियों को सहेजे, रिश्तो को जीना सीखे, निभाना नहीं।    

6 comments:

  1. जंगल के शेर भालू इत्यादि पशुओं के बच्चों को पकड़ कर, जैसे सर्कस वाले प्रशिक्षित कर के सर्कस देखने वालो की तालियाँ बटोरते है वैसे ही बच्चों की शिक्षण व्यवस्था है ।हंटर के डर से और पेट की आग बुझाना इस शिक्षा को पाने का एकमात्र मोटीवेशन हैं । फर्क इतना-सा है कि सर्कस में पशुओं को मुफ्त में प्रशिक्षित किया जाता हैं, स्कूलों में बिगडैल, महात्वाकांक्षी माता पिता अपनी आय का बहुत बड़ा भाग खर्च करते हैं ।

    बहुत अच्छा लेख । व्यंग के साथ साथ सच्चाई के साथ साथ ।
    विधा के लक्षण और प्रयोजन " विधा विनम्र बनाती है " तथा विधा वही होती है जो मुक्त करे " से कोसो दुर।

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    1. Thanks a lot for your kind words.
      As a teacher the opportunity to mingle with kids of different age groups are the biggest incentive for me but at times the reality of today's education system stares at you.

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  2. Nandini , as much hilariously written it is, it definitely touches the darker side of education in today's scenario. Teachers like you and me still belong to old traditions of teaching but we are always ready and eager to embrace the new too. Literacy and education are two most confusing terms these days. Marks are good. But they are no guarantee to knowledge and wisdom...sometimes I wonder in today's age when we have technology, money at our behest, why are there no names like Kalam, Narlikar,Yashpal , or for that matter Premchand,Nirala,Sharatchandra in making today. Do they don't make them like this anymore? Whereas marks in boards shout a different story altogether

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    1. Thanks and well said. Yes, certainly board marks and the real potential hardly match. And I feel that the onus to change the mindset is on us after all we are the creators of next gen.

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  3. आपके द्वारा लिखे गए लेख का एक एक शब्द सत्य से ओत प्रोत है| यही आज का सच है और आधुनिकता की पहचान|

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